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Swami Vivekananda

भारत के महापुरुष

Rs.10.00
भारत के महापुरुष
VRM Code: 
1620
Edition: 
3
Format: 
Soft Cover
Pages: 
24
Volumes: 
1
भारत के महापुरुष

Lecture Delivered by Swami Vivekananda at Chennai.

भारत का भविष्य

Rs.10.00
भारत का भविष्य
VRM Code: 
1542
Edition: 
3
Format: 
Soft Cover
Pages: 
28
Volumes: 
1

Lecture Delivered by Swami Vivekananda at Chennai.

अद्धितीय भारत

Rs.180.00
अद्धितीय भारत
VRM Code: 
3080
Publication Year: 
2014
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
588
Volumes: 
1
अद्धितीय भारत

भारत से इस प्रकार प्रेम करो जिस प्रकार स्वामी विवेकानन्द करते थे|

বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা (Vivekananda Hindu Chetana)

Rs.40.00
বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা
বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা
Translator: 
Dr. Maheswar Hazarika
VRM Code: 
1908
Publication Year: 
2012
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
119
Volumes: 
1
বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা
বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা

अग्निशिखा भगिनी निवेदिता

Rs.55.00
अग्निशिखा भगिनी निवेदिता
अग्निशिखा भगिनी निवेदिता
Translator: 
संगीता सोमण
VRM Code: 
3051
Publication Year: 
2013
Edition: 
First
Format: 
Soft Cover
Pages: 
174
Volumes: 
1
अग्निशिखा भगिनी निवेदिता
अग्निशिखा भगिनी निवेदिता

अपने समाज बन्धुअों के प्रति अनुकम्पा, सहानुभूति ये गुण विकसित करने का दायित्व हर माँ का है। उसके लिये विशेष रुप से प्रयत्नशील होना चाहिए। इस गुण के विकास से उन्हें दूसरों के दुख दर्द सहजता से समझ में अायेंगे। अपने देश पर किस प्रकार का व कैसा संकट अाया है वह भी समझ पायेंगे। इन्हीं में से उत्तम कार्यकर्ता तैयार होंगे। ये कार्यकार्ता देश के लिये तथा देशवासियों के लिए प्राणों की बाजी लगावेंगे । अाज तक इस देश ने हमें जो भी दिया है उसके प्रति हमारे मन में कृतज्ञता होनी चाहिए। इस माता ने हमें अन्न-जल दिया, मित्र दिये, धर्म, समाज, संस्कृति दी, जीवन विषयक श्रध्धा दी। यही तो अपनी माता है। उसे अब "महा" म

विश्वविजय का आत्मविश्वास

Rs.20.00
विश्वविजय का आत्मविश्वास
विश्वविजय का आत्मविश्वास
Translator: 
Chandrakant Vishnu Moghe
VRM Code: 
1905
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
32
Volumes: 
1
विश्वविजय का आत्मविश्वास
विश्वविजय का आत्मविश्वास

मेरे अमेरिकन बहनों एवं भाइयों, स्वामी विवेकानन्द का शिकगो में प्रवचन के प्रारंभ का यह संबोधन अजरामर हो गया। वास्तविक रुप से देखा जाय तो बंधुत्व भाव और आत्मियता यह हिन्दू समाज और संस्कृति का सहज भाव है। यहाँ की सैकड़ों पीढ़ियों के मानस में, इस मिट्टी में विकसित संस्कृति ने इसे स्थापित किया है। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द के मुख से वह सहज रुप से बाहर आया। अपने-अपने धर्म-दर्शन की श्रेष्ठता के संबंध में आत्ममुग्धता में डूबे हुए पाश्चात्य विद्धानों की दृष्टि में वह उदगार और इसमें अंतर्भूत भाव इससे पूर्व उन्होंने कभी अनुभव नहीं किया था। इसीलिए, सबको वह अदभुत लगा और समूचा सभागृह तालियों की गड़गड़ाहट से

ভাহত জাগৰন (Bharat Jagaran)

Rs.70.00
ভাহত জাগৰন
Translator: 
Dr. Maheswar Hazarika
VRM Code: 
1909
Publication Year: 
2012
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
162
Volumes: 
1
ভাহত জাগৰন

Rendering of Swami Vivekananda.

अलासिंग पेरुमल

Rs.35.00
विवेकानन्द के परम शिष्य अलासिंग पेरुमल
Translator: 
Kalyani Phadake
VRM Code: 
3022
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
92
Volumes: 
1
विवेकानन्द के परम शिष्य अलासिंग पेरुमल

अलासिंगजी एक आदर्श शिक्षक थे। वह अपने विषय को इतना अधिक सरल करके समझाते कि, कमजोर से कमजोर विद्यार्थी भी उनके विषय को सहजता से समझ जाता। यह अलासिंगजी का बड़प्पन ही था कि, विद्यालय समय में विद्यार्थीयों को पढ़ने के अतिरिक्त समय में भी उनका मार्गदर्शन किया करते। उनकी दृष्टि में विद्यार्थी उनके लिये ईश्वर के समान था तथा पढ़ाना ईश्वर की पूजा थी। यही कारण था कि अलासिंगजी अपने विद्यार्थीयों के बीच अत्यन्त आदरणीय शिक्षक थे। एक आदर्श शिक्षक के रुप में ही उनका यश सम्पूर्ण चैन्नई में फैल चुका था।

स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता

Rs.25.00
स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता
स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता
VRM Code: 
3050
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
48
Volumes: 
1
स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता
स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता

सदियों से अस्पृश्यता और तिरस्कार भोगने वाले समुदायों में दो प्रकार के लोग हैं। कुछ में दास भाव आ गया है और कुछ में विद्रोही और आक्रामक तेवर दिखाई देता है। स्वामीजी दास-भाव से मुक्त होकर उनमें स्वाभीमान और आत्मविश्वास जगाने की जरुरत समझते हैं। दूसरी ओर वह आक्रोश को भी व्यर्थ मानते हैं । स्वामीजी कहतें हैं - "ब्राह्मणेत्तर जातियों से मैं कहता हूँ, उतावले मत बनो, ब्राह्मणों से लड़ने का प्रत्येक अवसर मत खोजते रहो।... तुमको आध्यात्मिकता और संस्कृत शिक्षा छोड़ने को किसने कहा ? तुम उदासीन क्यों बने रहे ? तुम अब क्यों कुड़कुड़ते हो ?

युगनायक

Rs.40.00
युगनायक
युगनायक
Translator: 
Prof. Manisha Bathe
VRM Code: 
1744
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
84
Volumes: 
1

प्रा. शैलेन्द्रनाथ धर का योगदान

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