Swami Vivekananda

বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা

Rs.40.00
বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা
বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা
Translator: 
Dr. Maheswar Hazarika
Publication Year: 
2012
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
119
Volumes: 
1
VRM Book Code: 
1908
বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা
বিবেকানন্দৰ হিন্দু চেতনা

अग्निशिखा भगिनी निवेदिता

Rs.55.00
अग्निशिखा भगिनी निवेदिता
अग्निशिखा भगिनी निवेदिता
Translator: 
संगीता सोमण
Publication Year: 
2013
Edition: 
First
Format: 
Soft Cover
Pages: 
174
Volumes: 
1
VRM Book Code: 
3051
अग्निशिखा भगिनी निवेदिता
अग्निशिखा भगिनी निवेदिता

अपने समाज बन्धुअों के प्रति अनुकम्पा, सहानुभूति ये गुण विकसित करने का दायित्व हर माँ का है। उसके लिये विशेष रुप से प्रयत्नशील होना चाहिए। इस गुण के विकास से उन्हें दूसरों के दुख दर्द सहजता से समझ में अायेंगे। अपने देश पर किस प्रकार का व कैसा संकट अाया है वह भी समझ पायेंगे। इन्हीं में से उत्तम कार्यकर्ता तैयार होंगे। ये कार्यकार्ता देश के लिये तथा देशवासियों के लिए प्राणों की बाजी लगावेंगे । अाज तक इस देश ने हमें जो भी दिया है उसके प्रति हमारे मन में कृतज्ञता होनी चाहिए। इस माता ने हमें अन्न-जल दिया, मित्र दिये, धर्म, समाज, संस्कृति दी, जीवन विषयक श्रध्धा दी। यही तो अपनी माता है। उसे अब "महा" म

विश्वविजय का आत्मविश्वास

Rs.20.00
विश्वविजय का आत्मविश्वास
विश्वविजय का आत्मविश्वास
Translator: 
Chandrakant Vishnu Moghe
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
32
Volumes: 
1
VRM Book Code: 
1905
विश्वविजय का आत्मविश्वास
विश्वविजय का आत्मविश्वास

मेरे अमेरिकन बहनों एवं भाइयों, स्वामी विवेकानन्द का शिकगो में प्रवचन के प्रारंभ का यह संबोधन अजरामर हो गया। वास्तविक रुप से देखा जाय तो बंधुत्व भाव और आत्मियता यह हिन्दू समाज और संस्कृति का सहज भाव है। यहाँ की सैकड़ों पीढ़ियों के मानस में, इस मिट्टी में विकसित संस्कृति ने इसे स्थापित किया है। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द के मुख से वह सहज रुप से बाहर आया। अपने-अपने धर्म-दर्शन की श्रेष्ठता के संबंध में आत्ममुग्धता में डूबे हुए पाश्चात्य विद्धानों की दृष्टि में वह उदगार और इसमें अंतर्भूत भाव इससे पूर्व उन्होंने कभी अनुभव नहीं किया था। इसीलिए, सबको वह अदभुत लगा और समूचा सभागृह तालियों की गड़गड़ाहट से

ভাহত জাগৰন (Bharat Jagaran)

Rs.70.00
ভাহত জাগৰন
Translator: 
Dr. Maheswar Hazarika
Publication Year: 
2012
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
162
Volumes: 
1
VRM Book Code: 
1909
ভাহত জাগৰন

Rendering of Swami Vivekananda.

अलासिंग पेरुमल

Rs.35.00
विवेकानन्द के परम शिष्य अलासिंग पेरुमल
Translator: 
Kalyani Phadake
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
92
Volumes: 
1
VRM Book Code: 
3022
विवेकानन्द के परम शिष्य अलासिंग पेरुमल

अलासिंगजी एक आदर्श शिक्षक थे। वह अपने विषय को इतना अधिक सरल करके समझाते कि, कमजोर से कमजोर विद्यार्थी भी उनके विषय को सहजता से समझ जाता। यह अलासिंगजी का बड़प्पन ही था कि, विद्यालय समय में विद्यार्थीयों को पढ़ने के अतिरिक्त समय में भी उनका मार्गदर्शन किया करते। उनकी दृष्टि में विद्यार्थी उनके लिये ईश्वर के समान था तथा पढ़ाना ईश्वर की पूजा थी। यही कारण था कि अलासिंगजी अपने विद्यार्थीयों के बीच अत्यन्त आदरणीय शिक्षक थे। एक आदर्श शिक्षक के रुप में ही उनका यश सम्पूर्ण चैन्नई में फैल चुका था।

स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता

Rs.25.00
स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता
स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
48
Volumes: 
1
VRM Book Code: 
3050
स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता
स्वामी विवेकानन्द और अस्पृश्यता

सदियों से अस्पृश्यता और तिरस्कार भोगने वाले समुदायों में दो प्रकार के लोग हैं। कुछ में दास भाव आ गया है और कुछ में विद्रोही और आक्रामक तेवर दिखाई देता है। स्वामीजी दास-भाव से मुक्त होकर उनमें स्वाभीमान और आत्मविश्वास जगाने की जरुरत समझते हैं। दूसरी ओर वह आक्रोश को भी व्यर्थ मानते हैं । स्वामीजी कहतें हैं - "ब्राह्मणेत्तर जातियों से मैं कहता हूँ, उतावले मत बनो, ब्राह्मणों से लड़ने का प्रत्येक अवसर मत खोजते रहो।... तुमको आध्यात्मिकता और संस्कृत शिक्षा छोड़ने को किसने कहा ? तुम उदासीन क्यों बने रहे ? तुम अब क्यों कुड़कुड़ते हो ?

युगनायक

Rs.40.00
युगनायक
युगनायक
Translator: 
Prof. Manisha Bathe
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
84
Volumes: 
1
VRM Book Code: 
1744

प्रा. शैलेन्द्रनाथ धर का योगदान

पथदीप

Rs.55.00
Pathdeep
Translator: 
Kalyani Phadake
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
176
Volumes: 
1
VRM Book Code: 
3049
Pathdeep

अपनी जीवन यात्रा सुखकर हो इसलिए पथदीप की आवश्यकता होती है। वह पथदीप होता है संस्कारो का। उसमें माँ-बाप, गुरुजन, बड़ों के आदर्श आदि का समावेश होता है। ऐसा ही पथदीप हमें स्वामीजी के कथाओं से मिलेगा। स्वामीजी के सहवास में कितने ही लोगों के जीवन में परिवर्तन आया। इतना ही नहीं उनके विचारों के प्रभाव के कारण पूरा विश्व गहरी नींद से जाग उठा।

यह कथाओं का पथदीप जैसे बच्चों को प्रेरणा देगा, आत्मविश्वास को जगायेगा वैसे ही अभिभावकों का भी मार्गदर्शन करेगा ऐसा विश्वास है।

Swami Vivekananda:Pioneer of Cultural Nationalism

Rs.40.00
Swami Vivekananda:Pioneer of Cultural Nationalism
Swami Vivekananda:Pioneer of Cultural Nationalism
Publication Year: 
2013
Edition: 
1
Format: 
Soft Cover
Pages: 
112
Volumes: 
1
Language: 
English
VRM Book Code: 
1642
Swami Vivekananda:Pioneer of Cultural Nationalism
Swami Vivekananda:Pioneer of Cultural Nationalism

Swamiji's Complete Works have been published besides innumerable research works and works by eminent thinkers comprising manifold dimensions of him no doubt, it is yet found lacking in certain areas. Illustratively, Vivekananda appeared before the nation and the world in his individual capacity. There is no dispute over it; but along with a host of great savants of his time, namely Dayananda, Bankim Chandra, Tilak and Aurobindo, he obviously constitutes a well defined school of thought, and which may be wisely entittled as the "Cultural Nationalism in Indian Perspective".

Swami Vivekananda in London

Rs.60.00
Swami Vivekananda in London
Swami Vivekananda in London
Translator: 
Swami Yogeshananda
Publication Year: 
2015
Edition: 
2
Format: 
Soft Cover
Pages: 
162
Volumes: 
1
Language: 
English
VRM Book Code: 
1845
Swami Vivekananda in London
Swami Vivekananda in London

This is the only translation into English that we know of, of portions of the Bengali book Londoner Swami Vivekananda by his younger brother, Mahendranath Datta, who lived with him for much of his time in England, in1895 and 1896. The book was published in 1937 by Mahendra Publishing Committee, Calcutta. The book's author reports the events and remarks surrounding Swami Vivekananda and his close associates. He also includes his own profuse observations and theories regarding the teachings Swamiji gave in London.

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